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वक़्त
का परिंदा
कुनमुनाने
लगा था .
मेरे हाथो से छूट
मेरे हाथो से छूट
उड़कर दूर कहीं
जाने
लगा था |
पूछना
चाहती थी उससे
पर मैं कुछ भी
पूछ
ना पायी |
उसने भी छूटते ही
उसने भी छूटते ही
जोर
से अपनी नज़र
दूर
घुमाई,
फिर उड़ चला
अनजानी
दिशा में |
मैंने कहा भी
मैंने कहा भी
तुम्हे
पता है क्या ?
इस नगर की डगर
इस नगर की डगर
और
अनजाने से रास्ते ,
रुको
तो जरा ,
ठहर
भी जाओ यही |
पर कहा सुना
पर कहा सुना
उसने
भी कुछ
उड़ान भरने की
उड़ान भरने की
चाह
जो थी |
अक्सर ऊँची उड़ानों में
अक्सर ऊँची उड़ानों में
परिंदे
भी कहीं
भटक
कर रह जाते है,
कुछ मिले न मिले
कुछ मिले न मिले
उन्हें
उड़ान में पर
कुछ
रिश्ते जरुर खो जाते है |
by -sakhi singh
..१.०० ऍम ....१९/४/१४ 
3 comments:
कुछ पाने को खोने का सिलसिला तो हमेशा ही होता है ... पर खोने के डर से उड़ान तो नहीं रूकती ...
kavita-utam
shukriya digamber ji aur aditya ji
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