Saturday, April 19, 2014

वक़्त का परिंदा

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वक़्त का परिंदा
कुनमुनाने लगा था .
मेरे हाथो से छूट
उड़कर दूर कहीं
जाने लगा था |
पूछना चाहती थी उससे
पर मैं कुछ भी
पूछ ना पायी |
उसने भी छूटते ही
जोर से अपनी नज़र
दूर घुमाई,
फिर उड़ चला
अनजानी दिशा में |
मैंने कहा भी
तुम्हे पता है क्या ?
इस नगर की डगर
और अनजाने से रास्ते ,
रुको तो जरा ,
ठहर भी जाओ यही |
पर कहा सुना
उसने भी कुछ
उड़ान भरने की
चाह जो थी |
अक्सर ऊँची उड़ानों में
परिंदे भी कहीं
भटक कर रह जाते है,
कुछ मिले न मिले
उन्हें उड़ान में पर
कुछ रिश्ते जरुर खो जाते है |



by -sakhi singh 
..१.०० ऍम ....१९/४/१४ 

3 comments:

दिगम्बर नासवा said...

कुछ पाने को खोने का सिलसिला तो हमेशा ही होता है ... पर खोने के डर से उड़ान तो नहीं रूकती ...

Aditya Tikku said...

kavita-utam

gyaneshwaari singh said...

shukriya digamber ji aur aditya ji

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी