नर्क का ये द्वार है या
स्वर्ग पे जाने का मार्ग
जा रहे हो कौन पथ पर ?
करके ख़ुद को शर्मशार
हर तरफ़ है खून फैला
धरती माँ का आंचल मैला
जा रहे हो कौन पथ पर ?
लोगो का यु करके संहार
कितने सपने थे सजाये
जब हुआ था ये देश आजाद
जा रहे हो कौन पथ पर ?
फैला कर यहाँ भ्रस्टाचार
रिश्तो का कोई मोल नही है
मीठे अब दो बोल नही है
जा रहे हो कौन पथ पर ?
किससे करे जाके गुहार
धर्म न है अब यहाँ पर
हुआ है अधर्म का राज
जा रहे हो कौन पथ पर ?
कैसे हो अब सबका उद्धार …4॥12॥08
18 comments:
धर्म है ना अब यहां पर, हुआ अधर्म का राज.....
बहुत ही सुंदर कविता, आज के हालाता पर एक दम सटीक. धन्यवाद
sakhijee
namaskaar
is rachna ke maadhyam se aapne ek samyik aur aparihaary vishay ko utha kar apni jagrukta ka parichay diya hai
badhaai
aapka
vijay
सुश्री "सखी"
बिलकुल सही लिखा है आपने मानवता तार-तार हो रही है.................
अनबोली घुटन में पस्त
मेरा चेहरा
मेरा कमरा
मेरा दफ़्तर
मेरा देश
भीतर कौन है जो हवा को मथ रहा है
भीतर कोई है
जो हवा बारूद से
ज़मीन, खिड़की, सड़क को
आसमान तक ले जाकर
खोल देगा .............
बहुत अच्छे प्रश्नों को समयानुसार रखा है........
सब ध्वस्त है, खामोश है...... अब किसका है इंतज़ार
(आ चल के तुझे, मैं ले के चलूं
इक ऐसे गगन के तले
जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले)-२
इक ऐसे गगन के तले
(सूरज की पहली किरण से, आशा का सवेरा जागे)-२
(चंदा की किरण से धुल कर, घनघोर अंधेरा भागे)-२
कभी धूप खिले, कभी छाँव मिले
लम्बी सी डगर न खले
जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो ......
(जहाँ दूर नज़र दौड़ आए, आज़ाद गगन लहराए)-२
(जहाँ रंग बिरंगे पंछी, आशा का संदेसा लाएं)-२
सपनो मे पली हँसती हो कली
जहाँ शाम सुहानी ढले
जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो ....
सपनों के ऐसे जहाँ में जहाँ प्यार ही प्यार खिला हो
हम जाके वहाँ खो जाएँ, शिकवा ना कोई गिला हो
कहीं बैर न हो, कोई ग़ैर न हो
सब मिलके यूँ चलते चलें
जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले
आ चल के तुझे मैं ले के चलूं ......
Pehle Pyaar ka pehla gam ,Pehli baar hain aankhein nam,Pehla hai tanhai ka ye mausam,
Aa bhi jaao varna ro denge hum,
Tum jo nahi to, duniya humko ,achchi nahi lagti.
Tum jo nahi to,baat koi ho,sachchi nahi lagti,
Humne dil ko samjhaya sau baton se behlaya,
Lekin dil ka dard nahi hota kam
Aa bhi jaao varna ro denge hum,
Humne dekhe,sath jo milke,sapne ruth gaye,
Sare khilone,kaanch k nikle,chann se tut gaye,
Ab hum hain, Tanhai hai,Ek udaasi chai hai,
dhadkan bhi hai jaise madham-madham
Aa bhi jaao varna ro denge hum,
Pehla hai tanhai ka ye mausam.............
कमाल किया है चित्र में /यदि यही चित्र उल्टा हो जाता तो ये पैर चरण हो जाते =ये पतन की और जा रहे हैं /शर्मशार करके किस पथ पर जारहे हो ?आँचल मैला ,आज़ादी के सपने ,रिश्तों का मोल और मीठी बोल शब्दों का चयन सुंदर /अधर्म के राज होने की बात तो बहुत पुरानी हो गई =धर्म अधर्म का पता ही नहीं है क्या धर्म है क्या अधम है / धर्म की इतनी परिभाषाएं है कि क्या बताएं /एक ही ठीक है ""पर हित सरिस धरम नही भाई /पर पीड़ा सम नहीं अधमाई / इसी को इस तरह भी कहा गया है ""परोपकाराय पुण्याय ,पापाय पर पीडनम्""
sachchaee ka aaeena hai ye rachana
............
..............
sakhi !
aaj tumhari sari rachanayen padhi .
sab ek se badh kar ek ,kisaki tareef karoon aur kisaki nahin ..........
meri hardik shubh-kamanayen tumhare liye
bahut sundar rachna . aur bahut prabhavshali bhi .. dharm hai na ab yahan par adharm ka raaj ...wah
aapko badhai ..
pls read my blog for new poems .
vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/
raj ji...
shukriya apko pasnad aayee kavita..
vijay ji shukriya
aaj hame jagruk hona hi chahiye is mamle mein kab tak chup rahega aam nagrik
abhishek ji
bhaut khub rahi apki kavita bhi...
shukriya sath diya..
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rashmi ji
bahut bahut shukriya sarahne ke liye...love u
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nitin ji doino songs bahut ache lage..
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BHUT KHUB
BHUT HI SUNDAR
shurkiya rajvere ji
समसामयिक रचना....
rajeev ji
aaj apko dekha blog par bhaut khsuhi hui....
shukriya yuhi sath bana rahe sadaa
sakhi
Aapki rachnao me jitna neeche utar raha hu..
Lagta hai us paar koi nayi duniya mil jayegi..
apoorva ji naye edunia ka nahi janti..magar jo is dunia se mil rah hai ya mila usko shbdo me dhal ke sahej liya hai..
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