Tuesday, March 12, 2013

ये दर्द

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मैं तुझसे जितना दामन छुडाती हूँ ...००.३९ ऍम ..१३/३/१३
उतने ही पैर पसार तू
मेरे सिर से पैर तक
तू रेंगता चला आता है ...
ए दर्द ! भला अब तू ही बता
तेरा मेरा कितना गहरा नाता है ?
में चाहती हूँ  तू रहे दूर कहीं
और में तुझसे दूर कहीं,
पर क्यों तुझे बस एक
मेरा ही साथ हमेशा भाता है ?
दर्द बता दे आज मुझे
सच सच कहना चुप न रहना
तू हरदम क्यों आज कल 
बस मुझ तक खिंचा आता है ?
क्यों साथ मेरा तुझे भाता है ?
जिनसे नाता जोड़ा मैंने
सबने तोड़ दिया रिश्ता
अपना-पण तो मिला नहीं
दर्द मिला मेरा हिस्सा.
चाहत बस इतनी सी थी कि
प्यार  भरी मुस्कान मिले
पर अनजानी थी मैं कि  
मुझे दर्द से जीवनदान मिले,
सुनते है दिल के रिश्ते भी
खून से पक्के होते है ...
पर कुछ लोग अहसास से परे
झूंठे रिश्ते ढोते है
बस झूंठे रिश्ते ढोते है.
.

8 comments:

दिगम्बर नासवा said...

रिश्तों के टूटने की चुन्बह दर्द का एहसास कराती है ... टीस लिए रचना ...

अरुण चन्द्र रॉय said...

उम्दा कविता

Unknown said...

wow...gud 1

Unknown said...

wow...gud 1

Hamid Khan said...

jab dard paaltoo nahi balki faaltoo samjhoge to apne aap door ho jayega.

gyaneshwaari singh said...

दिगम्बर नासवा जी, अरुण जी, सुमित जी, हामिद जी बहुत बहुत शुक्रिया

Manoj kr singh said...

सखी ,
जहाँ प्यार बहुत होता है वह जब छोटी सी बात भी बहुत जयादा दुःख का अहसास करा जाती है
हमें उससे दूर होने का अहसास ही पुरे दिलो दिमाग को झंझोड देता है तुम्हारी सुंदर रचना है .....

gyaneshwaari singh said...

thnx

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी