क्यो खेली खून की होली
एक बेटे की माँ बोली
कर रही थी उसका इंतज़ार
आँखों में लेकर सपने हज़ार
सपने वो सारे बिखर गए
आतंकी के अंगारों से
बेटे के टुकड़े बिखर गए
जिस माँ की आँखों में थे
बेटे के लिए सपने हजार
आज बिखरा उसका यू वजूद
कैसे लाश से भी करे दुलार
एक एक टुकड़ा कैसे बीने
बेटे को मौत से कैसे छीने
रो रो के करती यही पुकार
क्यो की बम्बो की बौछार
क्या उसके अन्दर दिल ही नही
क्या उसके अन्दर नही ज़मीर
ना था इंसा तो क्यो आया
इस दुनिया में उसे कौन लाया
आख़िर क्यो ये सब होता है
हर माँ का दिल यू रोता है
उसकी भी तो कोई माँ होगी
उसने भी दूध पिया होगा
फिर क्यो ना रखी दूध की लाज
है यही हर ग़मज़दा की पुकार …
कितनो के अपने बिछडे है
उनके ख्वाब भी बिखरे है
जिसने खोया है रिश्तो को
अब बीने बिखरी यादो को
लेकर दिल में सारी यादे
कहता है सबसे यही बातें
क्यो करते है ऐसा ये हाल
सब हो जाते जिससे निढाल
कब तक फैलेगा बहशीपन
लाशों पे होगा यू ही क्रंदन
लाशों पे होगा यू ही क्रंदन
10 comments:
यह शोक का दिन नहीं,
यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
यह युद्ध का आरंभ है,
भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
हमला हुआ है।
समूचा भारत और भारत-वासी
हमलावरों के विरुद्ध
युद्ध पर हैं।
तब तक युद्ध पर हैं,
जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
हासिल नहीं कर ली जाती
अंतिम विजय ।
जब युद्ध होता है
तब ड्यूटी पर होता है
पूरा देश ।
ड्यूटी में होता है
न कोई शोक और
न ही कोई हर्ष।
बस होता है अहसास
अपने कर्तव्य का।
यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
वास्तविकता है।
देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
एक कवि, एक चित्रकार,
एक संवेदनशील व्यक्तित्व
विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
लेकिन कहीं कोई शोक नही,
हम नहीं मना सकते शोक
कोई भी शोक
हम युद्ध पर हैं,
हम ड्यूटी पर हैं।
युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
कोई मुसलमान नहीं है,
कोई मराठी, राजस्थानी,
बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
हमारे अंदर बसे इन सभी
सज्जनों/दुर्जनों को
कत्ल कर दिया गया है।
हमें वक्त नहीं है
शोक का।
हम सिर्फ भारतीय हैं, और
युद्ध के मोर्चे पर हैं
तब तक हैं जब तक
विजय प्राप्त नहीं कर लेते
आतंकवाद पर।
एक बार जीत लें, युद्ध
विजय प्राप्त कर लें
शत्रु पर।
फिर देखेंगे
कौन बचा है? और
खेत रहा है कौन ?
कौन कौन इस बीच
कभी न आने के लिए चला गया
जीवन यात्रा छोड़ कर।
हम तभी याद करेंगे
हमारे शहीदों को,
हम तभी याद करेंगे
अपने बिछुड़ों को।
तभी मना लेंगे हम शोक,
एक साथ
विजय की खुशी के साथ।
याद रहे एक भी आंसू
छलके नहीं आँख से, तब तक
जब तक जारी है युद्ध।
आंसू जो गिरा एक भी, तो
शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।
इसे कविता न समझें
यह कविता नहीं,
बयान है युद्ध की घोषणा का
युद्ध में कविता नहीं होती।
चिपकाया जाए इसे
हर चौराहा, नुक्कड़ पर
मोहल्ला और हर खंबे पर
हर ब्लाग पर
हर एक ब्लाग पर।
- कविता वाचक्नवी
साभार इस कविता को इस निवेदन के साथ कि मान्धाता सिंह के इन विचारों को आप भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचकर ब्लॉग की एकता को देश की एकता बना दे.
sakhi jee
namaskaar
saamyik rachna ke liye badhaai
कब तक फैलेगा बहशीपन
लाशो पे होगा यू ही क्रंदन
aapka
vijay
bahut saamayik rachanaa hai.badhaai
aapne apne naam ke sath matlab "sakhi with feelings" haqiqat hai aur aaina hai......
dil mei utarti ye rachna aur aapki bhawanay jo is rachna mei aapne dali hain wo sacchai ko pardarshit karti lekin jis roop mei dali hain wo......
shabd to hain par likha nahi jata.....
kyunki shayad main bahut bhavuk huin.....
एक दर्पण,दो पहलू और ना जाने कितने नजरिये /एक सिपाही और एक अमर शहीद का दर्पण और एक आवाज
अक्षय,अमर,अमिट है मेरा अस्तित्व वो शहीद मैं हूं
मेरा जीवित कोई अस्तित्व नही पर तेरा जीवन मैं हूं
पर तेरा जीवन मैं हूं
अक्षय-मन
sirf nari ke sine mei hi dil aur wo shakti kyun hoti hai......?
wo hi samajhti hai jisne khoya hai apna
beta,apni beti,apna bhai,apna pati phir bhi
wo hi kyun aage badti hai..
uske paas dil bhi hai aur shakti bhi apne aap mei har jagha purn har tarf se viksit.....
->adhura mein huin bas "main"...
shkti hai to dil nahi kisi ko bhi nahi dekhta kisi ko bhi nahi bakshta....
aur dil hai to shakti nahi kisi par julm hote dekh to sakta hai
aur char aansu baha sakta hai par us julm rok nahi sakta na koshish karta rokne ki.....
ye "main" huin "main" ek "aadmi"
good bhut bhut acha likha ha
वेदना से परिपूर्ण रचना
aap sabhi ka bahut bahut shukriya jo waqt diya keemati
आंदोलित मन .. उफ़्फ़
नि:शब्द हूं..
बहुत सुंदर कृति .............हृदय विदारक ...........सादर प्रणाम !
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