Sunday, June 13, 2010

शाम का चम्पई रंग


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शाम का चम्पई रंग

उतरा है मेरे चेहरे पर

जैसे उगता हुआ सूरज

पानी से उभर रहा हो .

मेरे रंग के साथ ही

दमका है तेरा ख्याल

जैसे उसका रंग मेरे

चेहरे पे चढ़ रहा हो .

9 comments:

Manoj kr singh said...

bahut accha likha hai
sakhi ji apne

waw kya bat hai .............

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ said...

WAH! WAH! WAH!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

Wah wah wah....

qaabil-e-tareef rachna hai aapki sakhi ji..aap hamesha hee kamaal karti hain!!

मुकेश कुमार सिन्हा said...

badjiya!!! umda!!!...:)

रश्मि प्रभा... said...

bahut pyaare lage ye khyaal

gyaneshwaari singh said...

shukriya aap sabhi ke comments ke liye

अरुण चन्द्र रॉय said...

सखी जी आपकी ये छोटी सी कविता बहुत गहरा प्यार समेटे हुए है... कुछ बिम्ब नए हैं.. जैसे ... "उगता हुआ सूरज पानी से उभर रहा हो" या फिर "उसका रंग मेरे चेहरे पे चढ़ रहा हो ."... खूबसूरत रचना ! बधाई !

अरुण चन्द्र रॉय said...

सखी जी आपकी ये छोटी सी कविता बहुत गहरा प्यार समेटे हुए है... कुछ बिम्ब नए हैं.. जैसे ... "उगता हुआ सूरज पानी से उभर रहा हो" या फिर "उसका रंग मेरे चेहरे पे चढ़ रहा हो ."... खूबसूरत रचना ! बधाई !

gyaneshwaari singh said...

शुक्रिया अरुण जी आपने सराहा

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी