Friday, September 16, 2011

दिल तेरे साथ था पर रूठ गया

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जो सोचा था वो पल आया है
प्यार में सब ही तो गंवाया है
तेरे होने का भरम टूट गया
दिल तेरे साथ था पर रूठ गया
तुम साथ थे मगर फिर भी
मैंने समझा की तुम साथ में हो
एक तेरा आसरा था छूट गया
दिल तेरे साथ था पर रूठ गया
कितने अरमान से रखा था तुझे
अपने सीने में छिपा कर मैंने
प्यार मेरा तो बस झूट -मूठ गया
दिल तेरे साथ था पर रूठ गया
जो भांप लेते हो तुम भाव मेरे
फिर समझी क्यों मेरी धड़कन
वर्त्तमान है , संग भूत गया
दिल तेरे साथ था पर रूठ गया

8 comments:

मेरे भाव said...

सुदर कविता... दिवाली की हार्दिक शुभकामना !

gyaneshwaari singh said...

shukriya ji

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

क्या कहने
बहुत सुंदर

कविता रावत said...

bahut sundar marmsparshi rachna..

आहुति said...

बेहतरीन प्रस्तुती...

gyaneshwaari singh said...

महेंद्र जी
कविता जी
सुषमा जी
आप सभी का ह्रदय से आभार व्यक्त करती हूँ.

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

सखी जी बहुत सुन्दर भाव और अच्छी प्रस्तुति

..भ्रमर ५

अपने सीने में छिपा कर मैंने प्यार मेरा तो बस झूट -मूठ गया दिल तेरे साथ था पर रूठ गया

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत जज्बाती रचना. बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा, अच्छा लगा. मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद.

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी