Tuesday, September 25, 2012

पगली, बेचारी , दुखियारी

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उफ़ ये वेदना ..१.१ ऍम ...२६/९/१२
मन में तब से
आन बसी है
जान तडपती हुई
कोई जब राह में
मिली पड़ी है .
दर्द का है
मुझको आभास  
न कोई अपना
उसके पास ,
फिर भी आँखों ने
अपनों की
राह तकी  है .
कपडे मैले
तन भी मेला
मन का दर्पण
उजला सा है
अपनों के तिस्कार
के कारण ..
उसका अंग अंग
बिखरा सा है
एक अजीब से
सन्नाटे में
वो जीती है .
पगली, बेचारी
दुखियारी  
न समझे वो
दुनियादारी,
सबके हाथो
हुई प्रताडित,
फिर ये वेदना
उसका रूप रंग
पीती है .

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी