
चेहरे पे हसी का परदा है
गम की परछाई भी दिखती है
दिन हँसता है खामोशी से
राते बेवश सी तड़पती है
हर इंसा का ये मंजर है
हर दिल में चुभा कोई खंजर है
हर जीवन में खुशिया है कम
और गम की आग धधकती है
हर दर्द ढका है महमिल से
पर दर्द हटा नहीं है दिल से
पर सबसे छिपाने अपनी खिजां
पर्दा - दारी रखनी ही पड़ती है .
2 comments:
excellent........
magar mai aapko sach me hansakar rahoonga,parda hatakar rahoonga.
सखी जी
नमस्कार
परदा डारी, रचना पढ़ी अच्छा लगा,
गम कितने छुपेरूस्तम होते हैं
और कितनी तकलीफ़ देते हैं
जिनका गमों से पाला पड़ता है वही बता सकता है
आपका
साहित्य सहचर
डॉ. विजय तिवारी "किसलय "
जबलपुर
ये पंक्तियाँ अच्छी लगीं
चेहरे पे हसी का परदा है
गम की परछाई भी दिखती है
दिन हँसता है खामोशी से
राते बेवश सी तड़पती है
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