Thursday, August 14, 2008

*** उलझन ***


उलझन जो पड़ रही है
उनको जरा सुलझालो वरना
इनको सुलझा ना सके
तो एक डोर टूट जायेगी .......

जो डोर कहीं टूटी
फिर जुड़ नहीं वो सकती
जोड़ी जो डोरी फिर से
एक गांठ पड़ जायेगी .......
जो गांठ पड़ी फिर तो
कितनी भी कोशिशे हो
रिश्ता ये पहले जैसा
कभी न तू फिर पायेगी ...
सखी मत पड़ने दे इस

रिश्ते में गांठ कोई

बिना इस रिश्ते के तू
क्या जिन्दा रह पायेगी ...

ना तू जिन्दा रह पायेगी

बस जान तेरी ये जायेगी
ये उम्र भर का रिश्ता

ना जीते जी मिटा पायेगी




3 comments:

वेद प्रकाश सिंह said...

excellent........मै आपकी इस कविता को पढ़कर उलझ गया हूँ ,न कदम आगे बढ़ पाते है,न पीछे जा पाते है ,अब आप ही सुलझाए मेरी इस उलझन को क्योंकि ऐसी बाते सोचकर या दुसरे शब्दों मे कहे तो ऐसी कविता लिखकर आपने ही उलझाया है मुझे..........

रश्मि प्रभा... said...

ek ganth .......kitni taklife de jati hai,neend le jati hai,aur ek bhay ka saya ........ kaise rah payenge unke bina...
bahut bhawpurn,marmsparshi

विजय तिवारी " किसलय " said...

सखी जी
नमस्कार

कितनी हक़ीकत है आपकी अभिव्यक्क्ति में .
उलझन यदि समय रहते ना सुलझे तो वो कितना विकट रूप ले सकती है
दिलों मे गाँठ पड़ जाती है, और अंत में तो दुनिया का कुछ भी अच्छा नही लगता
ये आपके एहसास नहीं हक़ीकत हैं
आपका
साहित्य सहचर
डॉ. विजय तिवारी "किसलय "
जबलपुर

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी