Tuesday, August 19, 2008

~* रातों की स्याही *~
















रातों की स्याही से हम अक्श बनाते है
अपने ही आंसुओ से फिर वो अक्श मिटाते है .
 
नजरो से दूर होना जिनको ना था गवारा
अब एक नज़र को तरसे वो पास ना आते है .
 
जिनसे सहारे की उम्मीद की थी हमने
बेवस है अब हम जब वो छोड़ के जाते है .
 
जिनको किया है प्यार हमने जान से ज्यादा
अब प्यार के बदले हमको वो ठुकराते है .
 
अपनी जवानी हमने जिनपे लुटाई हँस कर
आखिरी लम्हों में भी ना वो साथ निभाते है .
 
जिनकी हँसी की खातिर हर दर्द सहा हमने
वो दर्द के सागर में खुद हमको डुबाते है .
 
जिनको सुनायी लोरी रातों को जाग हमने
वो आज फिर क्यूँ हमको नश्तर ही चुभाते है .
 
माँ बाप बने जब हम खुशियों का बसेरा था
खुद पर अकेली शब में मातम हम मानते है.



5 comments:

रश्मि प्रभा... said...

bahut bahut achhi ,
yahi hua hai aksar,jinhe hum har kadam pyaar karte hain,we us ehsaas se pare ho jate hain.....

phir ek sawaal rah jata hai,'hum kyun rote hain raaton ko koi kya jane,koi kya jane mere mann ki uljhi baaton ko'

Vinay said...

बहुत गहरे भावों में रंग भरने की कोशिश सार्थक है!

वेद प्रकाश सिंह said...

excellent........ऐसी रचना बहुत कम पढने को मिलती है ! जब मैंने इस कविता की पहली पंक्ति पढ़ा और जैसे-जैसे अगली पंक्तिया की और बढ़ता गया,मेरी सोच एक रही ,मगर अंतिम दो पंक्तियाँ पढ़कर मेरी सोच बदल गयी...ऐसा आप कैसे सोच लेती है ?

विजय तिवारी " किसलय " said...

सखी जी

नमस्कार

आपकी रचना पढ़ी
विरह भरा विवरण देकर इस रचना में जीवंतता ला दी है आपने.
सखी जी आज के बदलते परिवेश मे नैतिक मूल्‍यो का जिस तरह से अवमूल्यन हो रहा है उनको देखकर अब कुछ कहा नही जा सकता की अगली दशाब्दि में क्या होगा..
आज हर चीज़ बाज़ारवाद से प्रभावित होने लगी है, चाहे वे रिश्ते हों या फिर कोई उपभोग की वस्तुएँ..
अभी भी वक्त है हमें और अगली पीढ़ी को सम्हलने का. हमें अब चेतने की सख़्त ज़रूरत है.
देखिए ना आपको भी लिखना पड़ा.....

अपनी जवानी हमने जिनपे लुटाई हँस कर
आखिरी लम्हों में भी ना वो साथ निभाते है


आपका
विजय तिवारी " किसलय "

विजय तिवारी " किसलय " said...

सखी जी

नमस्कार

आपकी रचना पढ़ी
विरह भरा विवरण देकर इस रचना में जीवंतता ला दी है आपने.
सखी जी आज के बदलते परिवेश मे नैतिक मूल्‍यो का जिस तरह से अवमूल्यन हो रहा है उनको देखकर अब कुछ कहा नही जा सकता की अगली दशाब्दि में क्या होगा..
आज हर चीज़ बाज़ारवाद से प्रभावित होने लगी है, चाहे वे रिश्ते हों या फिर कोई उपभोग की वस्तुएँ..
अभी भी वक्त है हमें और अगली पीढ़ी को सम्हलने का. हमें अब चेतने की सख़्त ज़रूरत है.
देखिए ना आपको भी लिखना पड़ा.....

अपनी जवानी हमने जिनपे लुटाई हँस कर
आखिरी लम्हों में भी ना वो साथ निभाते है


आपका
विजय तिवारी " किसलय "

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी