
मीरा बनके अपने श्याम की
मैं भी साँवरी हो जाऊं
साँसों में मुरली पाऊँ।
यमुना के तट गोपियो के संग
राधा बन के मैं जाऊं
कृष्णा के संग यमुना तट पर
झूम झूम कर रास रचाऊं
रुक्मणी बन के अपने कन्हाई की
रानी मैं बन जाऊंउनके रंग में रंग के मैं तो
कान्हा मिलन को जाऊं.
5 comments:
ban jao radha,aur rukmini,
krishn ne awtaar liya hai,jhumon ,nacho,
kshanansh ke liye in rupon me sare pal ji lo...
sakhi ban jaye,krishn priya
wonderful...आपको इन रूपों मे देखकर बहुत अच्छा लगा! कृष्ण के लिए आपका ये प्रेम देखकर मुझे और भी अच्छा लगा! आपने इस कविता के माध्यम से मीरा ,राधा और रुक्मिणी ,इन तीन जिंदगी को जी लिया....... इस कविता पर टिप्पणी करने के लिए मेरी जिंदगी छोटी पड़ जाएगी,...मन तो करता है, मै इस कविता पर टिप्पणी करता रहूँ.......सचमुच एक बेहद ही खूबसूरत रचना...........मगर कृष्ण है कहाँ ?
sakhi ji
namaskaar
ek hi kavita men aapne three in one ka aanand pradaan kiya hai.
teenon hi view achchhe hain .
badhai
aapka
vijay "kislay"
rashmi ji..ved ji..vijay ji
shukriya apne sarha
bahut hi bhav purn aur krishna prem mai sarabor kavita hai, mann krishna prem mai prajwalit ho utha hai...
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