Saturday, August 23, 2008

कृष्ण priyaa


मीरा बनके अपने श्याम की
मैं भी साँवरी हो जाऊं

श्याम बसे अंग अंग में मेरे

साँसों में मुरली पाऊँ।



यमुना के तट गोपियो के संग

राधा बन के मैं जाऊं

कृष्णा के संग यमुना तट पर

झूम झूम कर रास रचाऊं



रुक्मणी बन के अपने कन्हाई की

रानी मैं बन जाऊं

उनके रंग में रंग के मैं तो

कान्हा मिलन को जाऊं.

5 comments:

रश्मि प्रभा... said...

ban jao radha,aur rukmini,
krishn ne awtaar liya hai,jhumon ,nacho,
kshanansh ke liye in rupon me sare pal ji lo...
sakhi ban jaye,krishn priya

वेद प्रकाश सिंह said...

wonderful...आपको इन रूपों मे देखकर बहुत अच्छा लगा! कृष्ण के लिए आपका ये प्रेम देखकर मुझे और भी अच्छा लगा! आपने इस कविता के माध्यम से मीरा ,राधा और रुक्मिणी ,इन तीन जिंदगी को जी लिया....... इस कविता पर टिप्पणी करने के लिए मेरी जिंदगी छोटी पड़ जाएगी,...मन तो करता है, मै इस कविता पर टिप्पणी करता रहूँ.......सचमुच एक बेहद ही खूबसूरत रचना...........मगर कृष्ण है कहाँ ?

विजय तिवारी " किसलय " said...

sakhi ji
namaskaar
ek hi kavita men aapne three in one ka aanand pradaan kiya hai.
teenon hi view achchhe hain .
badhai

aapka
vijay "kislay"

gyaneshwaari singh said...

rashmi ji..ved ji..vijay ji
shukriya apne sarha

Rajat Narula said...

bahut hi bhav purn aur krishna prem mai sarabor kavita hai, mann krishna prem mai prajwalit ho utha hai...

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी