Saturday, August 30, 2008

भावनाओं का अक्श


अपनी भावनाओं का अक्श

कलम से कोरे कागज पर
आज उतारना चाहा

पर जो कुछ भी मन में था

भावनाओं में बह गया

कागज़ खाली था
खाली ही रह गया

5 comments:

रश्मि प्रभा... said...

मुझे तो बहुत कुछ मिला इन पन्नों में,
तुहारा इंतज़ार,तुम्हारी उदासी,तुम्हारी उमीदें......
सब इन पन्नों में शक्ल लेते गए ,
गहरी भावनाएं .......

वेद प्रकाश सिंह said...

हाँ,इस भावनाओं की बाढ़ मे मुझे बहुत कुछ मिला...मगर क्या-क्या मिला मै बताऊँगा नहीं,क्योकि मुझे डर लगता है की कहीं आप उस पर अपना हक़ न जताने लगे....फिर भी अगर आपको ये पता है की भावनाओं के इस बाढ़ मे आपने अपना क्या-क्या बहा दिया है, तो आप बिलकुल चिंता न करे ,क्योकि ये सारी चीजे मेरे पास सुरक्षित है...इस भावनाओं की बाढ़ मे कही आप खुद भी तो नहीं बह गयी? हा हा हा हा हा..........हा ,बस आप हमेशा खुश रहे और आप अपनी तरह नहीं,मेरी तरह मुस्कराए..... a memorable poem for me

जय नारायण त्रिपाठी said...

Ati sunder ....
Bahut hee marmik...



Kagaz to khali rah gaya magar ...
aankhe to bhat gayi !

जय नारायण त्रिपाठी said...

Ati sunder ...
bahut hee marmik...


Kagaz to khali rah gaya magar aankhen to bhar gayi !

विजय तिवारी " किसलय " said...

sakhi jee
namaskaar
AAP KI ye panktiyaan padh kar kishor da ka gana yaad aa gaya :-
"MERA JEEVAN, KORA KAAGAJ , KORA HI RAH GAYA "
bhavnaaon ka rela aisa hi hota jo deen duniya se bekhabar kar deta hai.

aapki rachna men satyta hai

aapka
vijay

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी