
अपनी ही विदाई पर रोये बहुत है हम
यहाँ लोग कह रहे है सोते बहुत है हम
किस को कहे क़त्ल का हम अपने गुनाहगार
समझा जिसे भी अपना उसने ही किया सितम
ले क्यों दवा जब जख्म हमको अपनों ने दिए
अब क्यों लगाये अपने किसी जख्म पे मरहम
सोये जो अब हम न आँख खोलेंगे कभी
कर देना यारो तुम भी यादों को मेरी दफ़न
है कौन ‘सखी’ किसका छलावा है सब यहाँ
देगा वही खुदा वही करेगा अब कोई करम
4 comments:
is vidaayi pe hamen bhi rona aaya
apnon ke diye zakhm ko jo dekha to tut gaye phir bhi kahenge.....
manzilen aur bhi hain
तुम्हारी कवितायें, तुम्हारी नज्में, तुम्हारे गीत, तुम्हारी गज़लें
मुझे बहुत रुलाती हैं, मुझे सँभालने में मदर करो...इस तरह मत लिखो...मुझे समझने की कोशिश करो.
विदाई पर रोना नहीं मुस्कराना चाहिए,क्योंकि फिर किसी से मिलन होने वाला है, मिलन और जुदाई तो जीवन की रित है! ईश्वर ने ये जिंदगी हमें बैठकर आंसू बहाने के लिए नहीं दिया है बल्कि खुद भी हसने और दूसरो को हँसाने के लिए दिया है...चलिए कुछ ऐसा काम किया जाए जिससे दूर-दूर तक खुशियाँ ही खुशियाँ दिखाई दे........चलिए ऐसी विषयों पर कविता लिखते वक़्त आप जितना रोना चाहे रो ले, लेकिन कविता लिखने के पहले और कविता लिखने के बाद आप बिलकुल नहीं आँसू बहाएगी,ये वादा करना होगा.............आंसुओ से भरी एक बेहद ही खूबसूरत रचना
sakhi jee
namaste
rachna achchhi lagi
समझा जिसे भी अपना उसने ही किया सितम
ले क्यों दवा जब जख्म हमको अपनों ने दिए
aapka
vijay
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