
visit.. http://www.mahaktepal.कॉम
तुम पर मेरा हक ही क्या है भला
एक अजनबी कभी क्या हुआ है किसी का
फिर भला तुम पे हक कैसे रखूँ
तुम्हें मैं अपना भला कैसे कहूँ
दर्द तो होता है दिल भी मेरा रोता है
पर दिल के सोचने से सिर्फ़ क्या होता है
जो सचाई है सबने निभाई है
तो मेरे चाहने से भला क्या होता है
कोई चाहत नहीं थी दिल मे मेरे अब
न किसी चाहत को पैदा होने दिया
फिर आज क्यूँ कुछ उलझन है मन में
इस उलझन ने न मुझे रोने ही दिया
कभी अनजाने ही किसी अजनबी से
बातें तमाम होके पहचान होती है
दिल मे दर्द भी अंजाने में आता है
आँखे ये चुपके चुपके ही रोती हैं
5 comments:
तुम पर मेरा हक ही क्या है भला
एक अजनबी कभी क्या हुआ है किसी का
फिर भला तुम पे हक कैसे रखूँ
kitni sundar aur bhaavnaatmak panktiyaan hain
- vijay
shukriya
apne saraha
acha laga
bahut hi achhi rachna.......
bahut achi abhiyakti hai
- vijay
ye kavite apni khani se millte hai..thanks ji bhout acche
Post a Comment