Tuesday, April 28, 2009

कभी कभी अंजाने ही


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तुम पर मेरा हक ही क्या है भला
एक अजनबी कभी क्या हुआ है किसी का
फिर भला तुम पे हक कैसे रखूँ
तुम्हें मैं अपना भला कैसे कहूँ

दर्द तो होता है दिल भी मेरा रोता है
पर दिल के सोचने से सिर्फ़ क्या होता है
जो सचाई है सबने निभाई है
तो मेरे चाहने से भला क्या होता है

कोई चाहत नहीं थी दिल मे मेरे अब
किसी चाहत को पैदा होने दिया
फिर आज क्यूँ कुछ उलझन है मन में
इस उलझन ने मुझे रोने ही दिया

कभी अनजाने ही किसी अजनबी से
बातें तमाम होके पहचान होती है
दिल मे दर्द भी अंजाने में आता है
आँखे ये चुपके चुपके ही रोती हैं

5 comments:

Anonymous said...

तुम पर मेरा हक ही क्या है भला
एक अजनबी कभी क्या हुआ है किसी का
फिर भला तुम पे हक कैसे रखूँ
kitni sundar aur bhaavnaatmak panktiyaan hain
- vijay

gyaneshwaari singh said...

shukriya
apne saraha
acha laga

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi achhi rachna.......

विजय तिवारी " किसलय " said...

bahut achi abhiyakti hai
- vijay

Anonymous said...

ye kavite apni khani se millte hai..thanks ji bhout acche

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी