Monday, October 12, 2009

*~पथिक ~*


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मन व्यथित
क्यो है पथिक
मान का
कोई प्रश्न
या फिर तेरा
अपमान है
या तू यू ही
अंजान है
खुद से कभी
बाहर तू आ
कुछ प्राण भर
संगीत ला

रुनझुन बजे
कोई गीत अब
हर पल सजे
प्रीत अब
सब है नया
सुंदर सुघर
जो है इधर
वो ही उधर
अब मान ले
मन है तेरा
ज़रा बावरा
नाहक ही यू
व्यथित हुआ
सब ओर बस
अब है हँसी
हर साँस में
रचना बसी

है ये सृजन का
कोई गीत नया
संगीत नया
मन मीत नया
खुश हो ज़रा
सा ज्ञान ले
मेरा कहा अब
तू मान ले
हँस ले ज़रा
निश्छल हँसी
प्रकृति ने भी
एक कविता रची

तू है पथिक
इस राह का
समझेगा मर्म
तू आह का
इस आह को
कर दे हँसी
सच्ची सी हो
मन मे बसी
फिर हर कली
खिल जाएगी
जीवन मधुर
ये गाएगी
जीवन मधुर
ये गाएगी

3 comments:

vijay kumar sappatti said...

sakhi ji

sundar aur jeevan ko jaagrut karne waali kavita .. shabd itni khoobsurati se sajaye hue hai ki kya kaha jaaye ..pathik ko nirantar aage hi badhna hai ji ..
bahut khoob ...


Regards

Vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कविता.
धन्यवाद

श्याम जुनेजा said...

ITNA SUNDAR BLOG AUR NAM "SAKHI" ITNA ITNA PYARA.. LEKIN KAVITA KE SATH BEINSAFI.. SHABD KE MOH SE MUKT HOKAR LIKHO..BHAV JAISE AAYEIN VAISE LIKHO APNI TARAF SE KUCHH JODNYE GHTANYE KI JAROORAT NAHIN HOTI..YEH ACHHI KVITA BAN SAKTI THI

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी