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मन व्यथित
क्यो है पथिक
मान का
कोई प्रश्न
या फिर तेरा
अपमान है
या तू यू ही
अंजान है
खुद से कभी
बाहर तू आ
कुछ प्राण भर
संगीत ला
रुनझुन बजे
कोई गीत अब
हर पल सजे
प्रीत अब
सब है नया
सुंदर सुघर
जो है इधर
वो ही उधर
अब मान ले
मन है तेरा
ज़रा बावरा
नाहक ही यू
व्यथित हुआ
सब ओर बस
अब है हँसी
हर साँस में
रचना बसी
है ये सृजन का
कोई गीत नया
संगीत नया
मन मीत नया
खुश हो ज़रा
सा ज्ञान ले
मेरा कहा अब
तू मान ले
हँस ले ज़रा
निश्छल हँसी
प्रकृति ने भी
एक कविता रची
तू है पथिक
इस राह का
समझेगा मर्म
तू आह का
इस आह को
कर दे हँसी
सच्ची सी हो
मन मे बसी
फिर हर कली
खिल जाएगी
जीवन मधुर
ये गाएगी
जीवन मधुर
ये गाएगी
3 comments:
sakhi ji
sundar aur jeevan ko jaagrut karne waali kavita .. shabd itni khoobsurati se sajaye hue hai ki kya kaha jaaye ..pathik ko nirantar aage hi badhna hai ji ..
bahut khoob ...
Regards
Vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
बहुत सुंदर कविता.
धन्यवाद
ITNA SUNDAR BLOG AUR NAM "SAKHI" ITNA ITNA PYARA.. LEKIN KAVITA KE SATH BEINSAFI.. SHABD KE MOH SE MUKT HOKAR LIKHO..BHAV JAISE AAYEIN VAISE LIKHO APNI TARAF SE KUCHH JODNYE GHTANYE KI JAROORAT NAHIN HOTI..YEH ACHHI KVITA BAN SAKTI THI
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