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वो मेरे घर में आके ढूँढते है
ना जाने वो क्या यहाँ ढूँढते है
रखा है जो छिपा के मैने दिल में
उसे वो क्यूँ काग़ज़ो मे ढूँढते है
जो बिखरा पड़ा था काग़ज़ॉ में
उसे वो मेरे दिल में ढूँढते है
ना जाने गुम कहाँ जाकर हुआ है
हम अपने गुम शुकून को ढूँढते है
ज़ुबाँ से निकले लफ्जों को पकड़के
उन मे फिर एक नाम ढूँढते है
हम अपनी पुर-आशोब रातो में
अपने अज्म-ए-जवां को ढूँढते है
हमारा ढूँढना रंग लाया ना सखी
हम सब ही शुकून को ढूँढते है
ना जाने वो क्या यहाँ ढूँढते है
रखा है जो छिपा के मैने दिल में
उसे वो क्यूँ काग़ज़ो मे ढूँढते है
जो बिखरा पड़ा था काग़ज़ॉ में
उसे वो मेरे दिल में ढूँढते है
ना जाने गुम कहाँ जाकर हुआ है
हम अपने गुम शुकून को ढूँढते है
ज़ुबाँ से निकले लफ्जों को पकड़के
उन मे फिर एक नाम ढूँढते है
हम अपनी पुर-आशोब रातो में
अपने अज्म-ए-जवां को ढूँढते है
हमारा ढूँढना रंग लाया ना सखी
हम सब ही शुकून को ढूँढते है
8 comments:
aur sach mein...
chaahte huye bhi palkein hata nahi sakte aapki rachna se.....
nazaron ko ek pakki jagah mile...aapke blog par aisa sthaan dhoondte hain...
aafareen....
रखा है जो छिपा के मैने दिल में
उसे वो क्यूँ काग़ज़ो मे ढूँढते है
बहुत सुंदर रचना जी
behtareen rachna hai...
waah..yahee to niyatee ka khel hai sakhee ji...ham sab taaumr kuch na kuch dhoondhate hee rahte hain.
Kamal ka likhaitn hain..aap
afsos ki der se pahuncha aapke blog par..keep it up.
आप सभी ने सराहा और साथ दिया बहुत अच्छा लगा .उम्मीद है आगे भी ऐसे ही साथ मिलता रहेगा
jise ap dhundti ho wo apke ander hi hai
sakhi ji
bhut hi acha likha hai apne
bahut sundar kavita
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