साल २०१० तुम जा तो रहे हो
मन को मेरे भरमा तो रहे हो
कभी लगता है मुझको मैंने
इस साल बहुत कुछ पा लिया है
पर लगता है अक्सर फिर मुझे
बहुत कुछ गवां दिया है
जो मिला है वो हर्षित करे
या जो गया है वो व्यथित करे ?
क्या अहसास है ,क्या सार है
जीवन कभी लगता ये भार है .
कभी एक पल ही ये व्यापार है
कभी ये मेरा पूरा संसार है .
जो भी है इसको ही हमें जीना है
हर दर्द और सुख को एक साथ ही
इस जीवन में हमें सीना है .
मरने के साथ ही यहाँ सबके
जीने के भी कई बहाने है
कोई न भी दे फिर भी हमें
कुछ पल खुशियों के चुराने है.



3 comments:
नये वर्ष २०११ की हार्दिक शुभकामनाएं ...
nav varsh ki shubhkaamnaayein Sakhi ji!
Very nice poem...
der se aane ke liye majrat chahunga.
aapko bhi naw warsh ki hardik subhkamnaye.
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