Thursday, March 31, 2011

क्यों जुदा जुदा है

visit.. http://www.mahaktepal.com/

एहसास इनको जीना



और इनमे घुटना


ये दो बात है .


कभी ये अहसास


जब हम जीते है


रोम रोम खिलता है


कभी ये अहसास


आग बन पिघलते है


तब अंग अंग जलता है.


है तो ये कुछ अहसास ही न


फिर क्यों जुदा जुदा है


इनको जीने का अंदाज़ .



4 comments:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

khoobsurat

Richa P Madhwani said...

nice post

vijay kumar sappatti said...

सखी जी
बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आया हूँ. औ बस इस नज़्म पर रुक गया .. दिल में अहसास औ भर गए है ...सच में आपका आभार इस पोस्ट के लिये ..

बधाई !!
आभार
विजय
-----------
कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

gyaneshwaari singh said...

surendra ji

richa ji
vijay ji shukriya aapne saraha

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी