Monday, July 15, 2013

तेरी यादें

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तेरी यादों को मैं रातों को कुछ ऐसे जगाती  हूँ
महकती चांदनी के नरम फाहों में सुलाती हूँ.

दिए तो जल ही उठते है बस तेरे ख्यालों से
मैं घर के सारे ही  दीपक खुद ही बुझाती हूँ.

है प्यासी आंखे ये दीदार को तेरे ही ए जालिम

भीगा कर अश्कों से मैं प्यास इनकी बुझाती हूँ. 




6 comments:

Manoj kr singh said...


मैं घर के सारे ही दीपक खुद ही बुझाती हूँ
भीगा कर अश्कों से मैं प्यास इनकी बुझाती हूँ.

वाह सखी जी वाह

आपकी कल्पनाये आपकी सोच बहुत हे मार्मिक होती है | आपकी लेखनी अंतर आत्मा को झंझोड देती है |

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

kya baat...kya baat...kya baat...

दिगम्बर नासवा said...

दिए तो जल ही उठते है बस तेरे ख्यालों से
मैं घर के सारे ही दीपक खुद ही बुझाती हूँ...

बहुत खूब .. गहरा एहसास लिए ये शेर मन को छू के गुज़र जाता है ... लाजवाब ...

gyaneshwaari singh said...

bhaiya shukriya

gyaneshwaari singh said...

surendra ji shukriyaa

gyaneshwaari singh said...

digmbar naswa ji bahut bahut shukriya

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी