visit.. http://www.mahaktepal.com
तेरी यादों को मैं रातों को कुछ ऐसे जगाती
हूँ
महकती चांदनी के नरम फाहों में सुलाती हूँ.
दिए तो जल ही उठते है बस तेरे ख्यालों से
मैं घर के सारे ही
दीपक खुद ही बुझाती हूँ.
है प्यासी आंखे ये दीदार को तेरे ही ए
जालिम
भीगा कर अश्कों से मैं प्यास इनकी बुझाती
हूँ.
6 comments:
मैं घर के सारे ही दीपक खुद ही बुझाती हूँ
भीगा कर अश्कों से मैं प्यास इनकी बुझाती हूँ.
वाह सखी जी वाह
आपकी कल्पनाये आपकी सोच बहुत हे मार्मिक होती है | आपकी लेखनी अंतर आत्मा को झंझोड देती है |
kya baat...kya baat...kya baat...
दिए तो जल ही उठते है बस तेरे ख्यालों से
मैं घर के सारे ही दीपक खुद ही बुझाती हूँ...
बहुत खूब .. गहरा एहसास लिए ये शेर मन को छू के गुज़र जाता है ... लाजवाब ...
bhaiya shukriya
surendra ji shukriyaa
digmbar naswa ji bahut bahut shukriya
Post a Comment