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पल कुछ बहके बहके से
चुपके चुपके चलते है
जैसे रात के आँचल पै
जुगनू टीमटीम करते है
पल कुछ सहमे सहमे से
अब दिन रात ही पलते है
जैसे कोई नई दुल्हन
ऐसे घर में चलते है
नव योवन नव प्यार लिए
जैसे नए नए प्रेमी
एक दूजे में ढलते है.
पल कुछ सीले सीले से
सीली सीली ऋतु लाये
जैसे सजल नयन कोई
रात की स्याही मलते है

3 comments:
पलों की दास्तां ... ये पल ही तो जीवन हो जाते हैं ...
सखी पहली बार इस गली में आना हुुआ। लगा पहले क्यों नहीं आया और ये भी कि कम वक्त केे लिए क्यूं आया। खूूब सामग्री स्तरीय और रुचिकर जुुटा रखी है। बार बार आना होगा। ये भी लगा कि मैं अपने ब्लॉग केे लिए इतना लापरवाह क्यों हूं। अच्छी प्रस्तुति केे लिए बधाई और शुभकामनाएं
शुक्रिया इस उत्साहवर्धन के लिए। एक वक़्त था जब बड़े जतन से इसे सजाया संवारा था। अब ब्लॉग्गिंग बहुत काम ही हो पाती है। अच्छा लगा आज आपकी वजह से फिर इस गली आई हूँ।😊
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