Sunday, November 24, 2013

पल कुछ

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पल कुछ बहके बहके से
चुपके चुपके चलते है
जैसे रात के आँचल पै
जुगनू टीमटीम करते है

पल कुछ सहमे सहमे से
अब दिन रात ही पलते है
जैसे कोई नई दुल्हन
ऐसे घर में चलते है



पल कुछ है श्रृंगार किये
नव योवन नव प्यार लिए
जैसे नए नए प्रेमी
एक दूजे में ढलते है.

पल कुछ सीले सीले से
सीली सीली ऋतु लाये
जैसे सजल नयन कोई
रात की स्याही मलते है 

3 comments:

दिगम्बर नासवा said...

पलों की दास्तां ... ये पल ही तो जीवन हो जाते हैं ...

सूरज प्रकाश. Blog spot. In said...

सखी पहली बार इस गली में आना हुुआ। लगा पहले क्‍यों नहीं आया और ये भी कि कम वक्‍त केे लिए क्‍यूं आया। खूूब सामग्री स्‍तरीय और रुचिकर जुुटा रखी है। बार बार आना होगा। ये भी लगा कि मैं अपने ब्‍लॉग केे लिए इतना लापरवाह क्‍यों हूं। अच्‍छी प्रस्‍तुति केे लिए बधाई और शुभकामनाएं

gyaneshwaari singh said...

शुक्रिया इस उत्साहवर्धन के लिए। एक वक़्त था जब बड़े जतन से इसे सजाया संवारा था। अब ब्लॉग्गिंग बहुत काम ही हो पाती है। अच्छा लगा आज आपकी वजह से फिर इस गली आई हूँ।😊

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी