Sunday, February 1, 2009

आवाज


ये आवाज कैसी है
जो
दिल पर दस्तक देती है
क्यो भला फिर सुनूँ मैं कुछ
जब
कोई आहट होती है
तुम्हारी
सांसो की आवाज
या एक वो अहसास
भर
देता है जब जीवन
फिर
अब है क्यो ये क्रंदन
दूर कभी होती है जब
आवाज
कही सन्नाटे में
ऐसे
दूर हुई है वो
क्या लौटेगी ????
फिर
कभी इस गली
जाने कब कैसे होगा
उन
कदमो का इस दर तक आके
फिर यूही अचानक कभी
आकर दस्तक देना
और
ये पूछना......
क्या
मैं सकती हूँ ????
इस
दालान से गुजर के
तेरे दिल तक जा सकती हूँ .............. रात्रि 2.४० ऍम //०९

6 comments:

रश्मि प्रभा... said...

एक उदासी......जो दिल तक उतर आई,बिना किसी आहट के.

Amit K Sagar said...

यकीन कर तू भी खुदा
एक रोज़ पिघल जायेगा
दालान से दूर एक दिन
मेरा दिया तू ही जलाएगा
--
वो रौशनी जितनी तू देकर गया था
मैंने ग़म के अंधेरों में बिता दी सारी
वो साँसे जितनी तू छोड़कर गया था
मैंने जीली है ज़िन्दगी उतनी तुम्हारी
--
मुझमें मेरा तो कुछ भी नहीं है
मेरा खुदा तुझे ख़बर ये बखूबी है
तू मुझसे सिर्फ़ बातें नहीं करता
तेरे होंटों से हर्फ़ के संग साँस चली है
आज साँसों कमी है, हाँ कमी है
---

राज भाटिय़ा said...

अति सुंदर.
धन्यवाद

gyaneshwaari singh said...

shukriyaaaaaaaaaaa...

ham doino jab sang ho to udaasi ka kya kaam hai na???


miss u love u

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sagar andaaaz-e-byaan acha laga

shurkiya

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raaj ji pasand kiya shukriya


regrds

sakhi

Anonymous said...

nice poem........

gyaneshwaari singh said...

saraswatlok ji
shukriya apne saraha

sakhi

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी