
चारो तरफ़ का तिलिस्म
धीरे धीरे टूट रहा है
धीरे धीरे हर रिश्ता मेरा
पीछे कही छूट रहा है
सुनो तुम तो जानते हो ना
ये रिश्ते मेरी जान है
फिर अब क्यो बदल रहे है
ये वक्त की आग में क्यो
इस तरह जल रहे है
इनमे जो आत्मा थी बसी
कहा वो खो गयी है
जो सुबह हुआ करते थे कभी
अब उनकी रात हो गयी है
कही रातों में गुम होकर
हम भी रह ना जाए
मेरे सपनो का महल भी
कहीं युही ढह ना जाए
कुछ तो ऐसा कर दो ना
मुझमे तिलिस्म बरक़रार रहे
रिश्तो से मुझे प्यार रहे
ऐसे प्राण भर दो ना
सुनो तुम ही कुछ तो कर दो ना
समय रात्रि ११.३० , दिनांक ..१७ /१/०९
10 comments:
भावनाओं से ओत-प्रोत सुन्दर कविता
बहुत सुंदर प्रस्तुति ....अच्छा लगा पढ़कर ...बधाई
चारो तरफ़ का तिलिस्म
धीरे धीरे टूट रहा है
धीरे धीरे हर रिश्ता मेरा
पीछे कही छूट रहा है
बहुत सुंदर कविता कही आप ने, बहुत भावुक, लेकिन आज सब के साथ यही हाल है.
धन्यवाद
wah kya baat kahi hai
rishton main pyaar rahe
tilism barqar rahe suno tumhi kuch kar do na
bhaut gahra hamesha hi tarah
achchi lagi.
रिश्तों का तिलिस्म टूटता है,पर किसी एक जगह
विश्वास का दिया जलता है,
यही पास होता है !
बहुत गहरे भाव हैं और बहुत ही सुन्दर
अरे वाह! ही अच्छा लिखा है....
क्या कामना की है आपने
मुझमे तिलिस्म बरक़रार रहे
रिश्तों से मुझे प्यार रहे ....
भावनाओं से ओत -प्रोत रचना
अक्षय-मन
sakhi ji
kitna sundar aur bhavpoorn hai
चारो तरफ़ का तिलिस्म
धीरे धीरे टूट रहा है
धीरे धीरे हर रिश्ता मेरा
पीछे कही छूट रहा है
these lines are ultimate..
meri shubkaamnayen .. aur likhe ,behtar likhe .
meri nai post dekhiyenga
dhanywad.
vijay
रिश्ता ...खुद एक तिलिस्म है ..
कभी जुड़ता है ,
कभी छूटता है ,
कभी टूटता है , और
फिर जुड़ता भी है .
वक़्त का खेल है..बस यह
बहोत ही अच्छी रचना..बधाई...
Too good..
Behtareen... Aur shabd nahi hai mere paas..
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