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मेरी आखिरी इच्छा तो पूछी होती ,
मुझे यादों में दफनाने से पहले
क़त्ल के गुनाहगार की भी अंतिम इच्छा
पूरी होती है फासी लगाने से पहले
पर हाय है ये कैसी बदनसीबी हमारी …..
मेरा कातिल ही मेरा मुंशिफ निकला
वो क्या मेरे हक़ में फैसला देता
मुझे खामोश मौत दिलाने से पहले
4 comments:
अगर उसने पूछा होता तो यह दर्द कहाँ से आता
क्या बात है सखी आज दर्द उभर उभर के बाहर आ रहा है.....लगता है बहुत ही गहरे दर्द में डूबकर लिखा है......
आपके भावः दीखते हैं आपकी रचना में.......
अक्षय-मन
bahut dard bhar rachna....khahi hamare blog par dastak de. aapka swagat ahi.
aap sabhi ka bhaut bhaut shukriya apka keemati waqt dene ke liye
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