Friday, October 23, 2009

तुम ही हो मेरा आदि अंत


मैं नही चाहती कोई जाने
मेरी हर रचना में
तुम्हारी ही छवि है
तुम्हारे ही एहसास है.



सब समझेंगे मेरी सोच
बस तुम तक ही पहुँचती है
मेरी रचनाओ की सीमा
तुमपर ही आकर रुकती है.



मे चाहती हूँ सब जाने
मेरा विस्तार कहा तक है
इस आसमा के पार या….???
इस धरती के हर छोर तक.



में फैल गई हूँ हर और
इसका ना कोई ओर छोर
क्यो की मेरी आँखो में
तुम ही हो मेरा आदि अंत

9 comments:

रश्मि प्रभा... said...

pyaar hi aadi aur ant hai aur sari chah uske ird-gird rahti hai,bahut hi badhiyaa

राज भाटिय़ा said...

क्यो की मेरी आँखो में
तुम ही हो मेरा आदि अंत
समर्पन बहुत सुंदर लगा.
बहुत सुंदर कविता.
धन्यवाद

Bhawna said...

निश्छल प्रेम में मनुष्य का विस्तार दर्शाती बहुत ही सुंदर कविता

बधाई

Amit K Sagar said...

अच्छी रचना.
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अंतिम पढ़ाव पर- हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

दिव्यांशी शर्मा said...

achha likh rahe ho

gyaneshwaari singh said...

aap sabhi ka bhaut bahut shukriya
apne saraha aur sath diya

Amit K Sagar said...

लिखते रहिये, शुभकामनाएं.
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महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!

gyaneshwaari singh said...

amit ji
shukriya

दीपिका said...

ahsaas chhupane se nahi chhupte. ye aankon se nikal bahar aa hi jate hai.

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी