
मैं नही चाहती कोई जाने
मेरी हर रचना में
तुम्हारी ही छवि है
तुम्हारे ही एहसास है.
सब समझेंगे मेरी सोच
बस तुम तक ही पहुँचती है
मेरी रचनाओ की सीमा
तुमपर ही आकर रुकती है.मे चाहती हूँ सब जाने
मेरा विस्तार कहा तक है
इस आसमा के पार या….???
इस धरती के हर छोर तक.
में फैल गई हूँ हर और
इसका ना कोई ओर छोर
क्यो की मेरी आँखो में
तुम ही हो मेरा आदि अंत
9 comments:
pyaar hi aadi aur ant hai aur sari chah uske ird-gird rahti hai,bahut hi badhiyaa
क्यो की मेरी आँखो में
तुम ही हो मेरा आदि अंत
समर्पन बहुत सुंदर लगा.
बहुत सुंदर कविता.
धन्यवाद
निश्छल प्रेम में मनुष्य का विस्तार दर्शाती बहुत ही सुंदर कविता
बधाई
अच्छी रचना.
---
अंतिम पढ़ाव पर- हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]
achha likh rahe ho
aap sabhi ka bhaut bahut shukriya
apne saraha aur sath diya
लिखते रहिये, शुभकामनाएं.
---
महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!
amit ji
shukriya
ahsaas chhupane se nahi chhupte. ye aankon se nikal bahar aa hi jate hai.
Post a Comment