Wednesday, April 2, 2008

क्या तुम कभी ये सोचते हो

क्या तुम भी कभी ये सोचते हो
की में तुम्हारी कौन हूँ
हम तुम अचानक एक दिन मिले
बन गए एक दुसरे के खास
काश ...एक दिन कोई मिला
और आ गया दिल के कितना पास
कभी तुम ये सोचते होगे की
किसी दिन अचानक युही .....
कोई और न आ जाये
मेरे इस दिल के करीब
जहाँ तुम रहते हो अभी
और आके कहीं न लेले तुम्हारी जगह

तुम ये सोचकर परेशां हो जाते होगे
अचानक से ख्यालो में में खो जाते होगे
तो में तुमसे कहना चाहूंगी
तुम जान बनकर हर पल
सीने में धड़कते हो मेरे
बनके लहू तुम रग रग में समाये हो
अब जान को निकाला तो मेरा जिस्म भी मर जायेगा
होगा न लहू रगों में तो जिस्म क्या कर पाएगा

2 comments:

वेद प्रकाश सिंह said...

तुम ये सोचकर परेशां हो जाते होगे
अचानक से ख्यालो में में खो जाते होगे
तो में तुमसे कहना चाहूंगी
तुम जान बनकर हर पल
सीने में धड़कते हो मेरे
बनके लहू तुम रग रग में समाये हो
अब जान को निकाला तो मेरा जिस्म भी मर जायेगा
होगा न लहू रगों में तो जिस्म क्या कर पाएगा
excellent......mai to pareshaan ho gaya,khyallo me bhi kho gaya...aage to aap janti hai aapko kya kahna hai.....ha ha ha ha...

विजय तिवारी " किसलय " said...

sakhi ji
kya ehsaas hain aapke
wakai aap badi mehnat karti hai, mehnat hi rang lati haikitna achcha likha hai ....
तुम ये सोचकर परेशां हो जाते होगे
अचानक से ख्यालो में में खो जाते होगे
तो में तुमसे कहना चाहूंगी
तुम जान बनकर हर पल
सीने में धड़कते हो मेरे
बनके लहू तुम रग रग में समाये हो
अब जान को निकाला तो मेरा जिस्म भी मर जायेगा
होगा न लहू रगों में तो जिस्म क्या कर पाएगा
aapka
VIJAY TIWARI "KISLAY "
JABALPUR

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

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सखी