Sunday, July 27, 2008

बचपन......परी.....चांदनी...कलम


मैं ना कोई परी एक इंसान हूँ
आके दुनियाँ में मैं भी हैरान हूँ
छड़ी जादू की मुझे मिली ना कोई
मिली है एक कलम जो है साथी मेरी
जब किसी से भी कही ना कोई बात गयी
मेरी इस सहेली ने सुनी और लिखी
सखी ना फिर कभी अकेली रही ..............
हमसाये सी कलम सहेली मिली
मखमली सपनो का ताना बाना बुना
सपनो का ताना बाना लगा टूटने ..........
ज्यों ज्यो ये सखी थोडी बड़ी हुई
दुनिया मखमली कहाँ है भला
सपने जब बिखरे तो लगने लगा
मेरा बचपन ही है सबसे भला
एक दिन मेरे सब सपनो ने रुख मोड़ लिया
हर सपने से मैंने भी नाता तोड़ लिया
अब बचपन फिर मेरे साथ था खडा ....

सपनो का बिखरना हमें तोड़ देता है
बचपन खुशियों से जोड़ देता है ....
वो परिया जो कहानियो में रही
अब वो मेरे ही अन्दर पले
सब हसीं है यहाँ अब दर्द भी कम है
है मेरी सहेली मेरे साथ में
अब भी ये अक्सर चांदनी में संग मेरे चलती है
सपनो के पंख लिए वो परी मेरे अन्दर पलती है

7 comments:

Priya said...

स्वागत है इस इन्टरनेट की दुनिया में.

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

Sajeev said...

आपको नए ब्लॉग की बधाई, बेहद सराहनीय प्रयास है आपका.
सक्रिय लेखन से हिन्दी चिट्टा जगत को समृद्ध करें.

आपका मित्र -
सजीव सारथी,
9871123997

तरूश्री शर्मा said...

सपनो का बिखरना हमें तोड़ देता है
बचपन खुशियों से जोड़ देता है ....
वो परिया जो कहानियो में रही
अब वो मेरे ही अन्दर पले
सब हसीं है यहाँ अब दर्द भी कम है
है मेरी सहेली मेरे साथ में
अब भी ये अक्सर चांदनी में संग मेरे चलती है
सपनो के पंख लिए वो परी मेरे अन्दर पलती है.

तुम्हें पढ़कर लगा कि तुम वही लिखती हो जो तुम सोचती हो इसीलिए लिखकर सुकून पाती हो, पढ़ने वाला भी जरूर इस सुकून से कुछ हिस्सा अपने लिए भी बांट लेगा। इस जज्बे को बचाकर रखना... जब भी लिखो अपने लिए लिखना, कमेंट्स के लिए नहीं। भगवान करे तुम्हारा कोई सपना कभी ना टूटे।

gyaneshwaari singh said...

priya ji, udan tastari ji, sanjiv ji..aap logo ka dil se shukriya ada karti hun aap sabne yahan aake mera swagat kiya ..acha laga.


taru shree sharmaa ji...apne sahi kaha mein likhti hun jo andar chalta hai use bahar laane ka pryash bhar hai meri rachnaye...
comments ka lobh nahi karti kyun ki janti hun dil ki awaj ko dil hi samjhegaa aur koi samjhne wala pade tabhi rachna pe comments likhna sarthak hai...kyun ki jajbata har koi nahi samjh sakta.

aur sukun to bhaut hai jo dil me ho us ebahar laana sukun paane ka jariya maatr hai. log dosto se ya pariwara mein kahte hai mein apni kalam se kah deti hun.

aapka sath mila yahan acha laga..apki duao ke liye shukriya.

sagar apne pada acha laga aur ye lines kya hai ...??? kai baar kuch na kahna bhi abhut kuch kah deta hai shayd.

shukriya

वेद प्रकाश सिंह said...

aapki is rachna par mujhe apni ek kavita yaad aa gayi...

mera bachpan kyo chhor gaya mujhe,
bata-e-jindagi fir wapas use mai bulaoon kaise.....

is rachna ko padhkar laga aapko aapka bachpan behad pasand tha...ved

विजय तिवारी " किसलय " said...

सखी

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है

कलाम और किताब जैसा वाकई कोई सखा नही हो सकता, जो सारे निर्णय आप पर ही छोड़ देता है, जो भी करना है आपको ही करना होता है.

सपनो का बिखरना हमें तोड़ देता है
बचपन खुशियों से जोड़ देता है ....

अच्छी बात कह दी आपने

आपका
विजय तिवारी " किसलय :

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी