Saturday, February 18, 2012

jagit singh ji ko samrpit


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हर एक शब्द तेरी रूह में जब उतरा है, पाके आवाज तेरी लफ्ज लफ्ज जिन्दा हुआ....

तोड़ कर दिल तुमको बुला पास अपने, खुदा क्यों इस खता पर अपनी ना शर्मिंदा हुआ.


तेरी गज़लों के नरम साये है ,
आज हम तुमसे मिलके आये है.


जब  बड़े  दर्द  हद  से ज्यादा ,
तेरी आवाज  से  राहत  पाये है .


तुम  हो  आज  भले  दूर कहीं ,
मगर  साथ  तेरी  ही  वफाये है .


भले  ही  आंख न देखे तुमको,
रूह  तो  पास  अपने  पाये  है .

तुम नहीं हो, है अहसास तेरा,
जब  भी  आवाज तेरी आये है.

तुमसे होने को रु-ब-रु हमने,
तेरे ही  शेर गुन - गुनाये  है.

तुम्हारी गज़लों में अहसास ऐसे,
फिजा में सिर्फ तेरी खुश्बू आये है.

गज़ल का शहंशाह जो याद आए,
‘सखी’ ने  अश्क  फिर  बहाए  है .

4 comments:

Manjit Thakur said...

बहुत बेहतर, उम्दा। मजा आ गया।

vidya said...

बहुत खूबसूरत समर्पण..

amrendra "amar" said...

Waah, Behtreen Prastuti

मुकेश कुमार सिन्हा said...

behtareeen........

आपका मेरे इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ...

आप यहाँ आये बहुत खुशी हुई .आपका प्यार और साथ हमेशा बना रहे, तो बहुत खुशी होगी. ये साथ और प्यार बनाए रखना.

प्यार के साथ
सखी